सूरत में कपड़े का थोक कारोबार करने वाले राजेश पटेल हर महीने अपने CA से एक ही शिकायत करते थे — “GSTR-1, GSTR-3B, ITC मैचिंग, HSN कोड… इतना टाइम तो मैं अपने बिज़नेस में लगाता तो ज़्यादा फायदा होता।” उनका सालाना टर्नओवर करीब ₹80 लाख था, न एक्सपोर्ट करते थे, न किसी दूसरे राज्य में सप्लाई। जब CA ने उन्हें GST कॉम्पोजीशन स्कीम के बारे में बताया, तो राजेश को पहली बार समझ आया कि छोटे और मीडियम बिज़नेस के लिए GST कानून में एक ऐसा रास्ता भी है जहां टैक्स रेट कम है, रिटर्न सिर्फ साल में एक बार भरना है, और रोज़-रोज़ के इनवॉइस मैचिंग के झंझट से भी छुटकारा मिल जाता है।
अगर आप भी किराना स्टोर, छोटी फैक्ट्री, बुटीक, सैलून, छोटा रेस्टोरेंट या फ्रीलांस सर्विस जैसा कोई काम करते हैं और GST की रोज़मर्रा की कंप्लायंस से थक गए हैं, तो यह गाइड आपके लिए है। इसमें हम बताएंगे कि कॉम्पोजीशन स्कीम किसे मिलती है, टर्नओवर लिमिट कितनी है, टैक्स रेट क्या है, कौन इसमें नहीं आ सकता, रजिस्ट्रेशन कैसे करें, और हर क्वार्टर-हर साल कौन सा रिटर्न भरना ज़रूरी है — सारी जानकारी सरकारी नियमों और भरोसेमंद सोर्स से वेरिफाई करके।

दरअसल भारत में लाखों छोटे दुकानदार, छोटी वर्कशॉप और फ्रीलांस सर्विस देने वाले लोग GST के पूरे सिस्टम को सिर्फ इसलिए मुश्किल मानते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि रेगुलर GST और कॉम्पोजीशन स्कीम में कोई फर्क नहीं है — दोनों में एक जैसी मेहनत लगेगी। असल में ऐसा बिल्कुल नहीं है। जिन बिज़नेस का काम सिर्फ अपने राज्य तक सीमित है और जो बड़े B2B क्लाइंट को इनवॉइस नहीं बेचते, उनके लिए कॉम्पोजीशन स्कीम पैसे और समय दोनों बचा सकती है।
GST कॉम्पोजीशन स्कीम क्या है?
GST कॉम्पोजीशन स्कीम, CGST Act, 2017 के Section 10 के तहत छोटे टैक्सपेयर्स के लिए बनाई गई एक सरल टैक्स व्यवस्था है। इसके तहत बिज़नेस को हर ट्रांजैक्शन पर अलग-अलग GST रेट (5%, 12%, 18%, आदि) कैलकुलेट करने की ज़रूरत नहीं होती। इसके बजाय, कुल टर्नओवर पर एक फ्लैट, बहुत कम रेट से टैक्स चुकाना होता है।
रेगुलर GST स्कीम में टैक्सपेयर हर महीने GSTR-1 और GSTR-3B भरता है, इनवॉइस-लेवल डिटेल देता है, और खरीद पर चुकाए गए टैक्स का Input Tax Credit (ITC) क्लेम कर सकता है। कॉम्पोजीशन स्कीम में यह बिल्कुल उल्टा है — कंप्लायंस बहुत आसान है, लेकिन बदले में टैक्सपेयर को कुछ चीज़ों की छूट नहीं मिलती, जैसे ITC क्लेम करना या ग्राहकों से GST चार्ज करना। आगे इस गाइड में हम दोनों पहलू विस्तार से समझेंगे।
कॉम्पोजीशन स्कीम के लिए टर्नओवर लिमिट कितनी है?
यह सबसे पहला और सबसे ज़रूरी सवाल है, क्योंकि लिमिट पार होने पर स्कीम से बाहर होना ज़रूरी हो जाता है। टर्नओवर की गिनती एक ही PAN पर रजिस्टर्ड सभी बिज़नेस को मिलाकर, पिछले फाइनेंशियल ईयर के आधार पर होती है।
गुड्स बिज़नेस (ट्रेडर, मैन्युफैक्चरर, रेस्टोरेंट) — ₹1.5 करोड़ तक
सामान बेचने वाले ट्रेडर, मैन्युफैक्चरर और शराब न बेचने वाले रेस्टोरेंट के लिए सामान्य लिमिट ₹1.5 करोड़ सालाना टर्नओवर है। अगर पिछले साल का टर्नओवर इससे कम था, तो चालू साल में कॉम्पोजीशन स्कीम चुनी जा सकती है।
स्पेशल कैटेगरी राज्यों में ₹75 लाख की लिमिट
उत्तर-पूर्वी और पहाड़ी राज्यों में यह लिमिट कम है। अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा और उत्तराखंड में कॉम्पोजीशन स्कीम के लिए टर्नओवर लिमिट ₹75 लाख है।
सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए अलग स्कीम — ₹50 लाख पर 6%
शुरुआत में कॉम्पोजीशन स्कीम सिर्फ सामान बेचने वालों के लिए थी। बाद में CGST Act के Section 10(2A) के तहत सर्विस देने वाले छोटे बिज़नेस (जैसे फ्रीलांसर, सलाहकार, सैलून, छोटे सर्विस सेंटर) के लिए अलग स्कीम बनाई गई, जिसकी टर्नओवर लिमिट ₹50 लाख सालाना है। इसके अलावा, जो बिज़नेस सामान के साथ-साथ थोड़ी सर्विस भी देते हैं (जैसे मोबाइल शॉप जो रिपेयरिंग भी करती है), वे टर्नओवर के 10% या ₹5 लाख, जो भी ज़्यादा हो, तक सर्विस दे सकते हैं और फिर भी गुड्स वाली कॉम्पोजीशन स्कीम में बने रह सकते हैं।
| बिज़नेस टाइप | टर्नओवर लिमिट | लागू सेक्शन |
|---|---|---|
| ट्रेडर / मैन्युफैक्चरर (सामान्य राज्य) | ₹1.5 करोड़ | Section 10(1) |
| ट्रेडर / मैन्युफैक्चरर (स्पेशल कैटेगरी राज्य) | ₹75 लाख | Section 10(1) |
| रेस्टोरेंट (शराब नहीं बेचता) | ₹1.5 करोड़ | Section 10(1) |
| सर्विस प्रोवाइडर / मिक्स्ड सप्लायर | ₹50 लाख | Section 10(2A) |
टर्नओवर कैलकुलेशन में क्या शामिल होता है?
लिमिट चेक करते समय सिर्फ एक दुकान या एक GSTIN का टर्नओवर नहीं, बल्कि एक ही PAN पर रजिस्टर्ड सभी बिज़नेस का टर्नओवर जोड़कर देखा जाता है — भले ही वे अलग-अलग राज्यों में हों या अलग-अलग नाम से चल रहे हों। इसमें टैक्सेबल सप्लाई, एग्ज़ेम्प्ट सप्लाई और एक्सपोर्ट तीनों शामिल होते हैं, लेकिन इनवर्ड सप्लाई पर रिवर्स चार्ज के तहत चुकाया गया टैक्स शामिल नहीं होता। यही वजह है कि अगर आपका एक बिज़नेस किसी पार्टनर के साथ साझा है और दूसरा अकेले नाम पर है, तो दोनों का टर्नओवर एक साथ गिना जा सकता है — इसलिए लिमिट के करीब पहुंचने पर अपने CA से पूरी पिक्चर ज़रूर दिखाएं।
टैक्स रेट कितना लगता है?
यही इस स्कीम की सबसे बड़ी खूबी है — रेट बहुत कम है, और हर इनवॉइस पर अलग-अलग कैलकुलेशन नहीं करनी पड़ती। कुल टैक्सेबल टर्नओवर पर यह फ्लैट रेट लागू होता है:
| बिज़नेस टाइप | CGST | SGST | टोटल रेट |
|---|---|---|---|
| मैन्युफैक्चरर | 0.5% | 0.5% | 1% |
| ट्रेडर (सिर्फ टैक्सेबल सप्लाई पर) | 0.5% | 0.5% | 1% |
| रेस्टोरेंट (शराब नहीं बेचता) | 2.5% | 2.5% | 5% |
| सर्विस प्रोवाइडर | 3% | 3% | 6% |
ध्यान दें — ट्रेडर के मामले में यह रेट सिर्फ टैक्सेबल सामान की बिक्री पर लगता है, न कि एग्ज़ेम्प्ट (टैक्स-फ्री) सामान की बिक्री पर भी। मैन्युफैक्चरर और सर्विस प्रोवाइडर के लिए यह पूरे टर्नओवर पर लागू होता है।

कॉम्पोजीशन स्कीम किसे नहीं मिलती?
कुछ बिज़नेस टर्नओवर लिमिट के अंदर होने पर भी इस स्कीम में नहीं आ सकते। नियम के मुताबिक ये बिज़नेस अयोग्य हैं:
- जो बिज़नेस दूसरे राज्य में सामान या सर्विस सप्लाई (inter-state outward supply) करता है।
- जो किसी ऐसे e-commerce ऑपरेटर के ज़रिए सर्विस बेचता है जिसे Section 52 के तहत TCS काटना ज़रूरी है (हालांकि 1 अक्टूबर 2023 से, कॉम्पोजीशन डीलर अपने ही राज्य में e-commerce ऑपरेटर के ज़रिए सामान बेच सकते हैं, बशर्ते सप्लाई इंटर-स्टेट न हो)।
- Casual taxable person और non-resident taxable person (जो अस्थायी रूप से किसी राज्य में बिज़नेस करते हैं)।
- वे मैन्युफैक्चरर जो Notification No. 14/2019-Central Tax में बताए गए नोटिफाइड सामान बनाते हैं — जैसे आइसक्रीम और अन्य खाने योग्य बर्फ के सामान, पान मसाला, तंबाकू और तंबाकू के विकल्प, एरेटेड वॉटर (कोल्ड ड्रिंक), फ्लाई ऐश ब्रिक्स/ब्लॉक्स, और कुछ तरह की बिल्डिंग ईंटें-टाइलें।
- जो शराब जैसा GST के दायरे से बाहर (non-taxable) सामान बेचते हैं।
- एक ही PAN पर रजिस्टर्ड सभी GSTIN को एक साथ स्कीम में आना होता है — अगर एक GSTIN रेगुलर स्कीम में है, तो बाकी सभी भी रेगुलर स्कीम में ही रहेंगे।
वर्कड एग्जाम्पल — टैक्स कितना बनेगा?
नीचे तीन अलग-अलग तरह के बिज़नेस के उदाहरण दिए गए हैं, ताकि कैलकुलेशन समझना आसान हो। मान लीजिए यह उनका सालाना टैक्सेबल टर्नओवर है और उन्होंने पूरे साल कॉम्पोजीशन स्कीम में रहकर कारोबार किया:
| उदाहरण | सालाना टर्नओवर | रेट | कुल टैक्स | CGST + SGST |
|---|---|---|---|---|
| राजेश पटेल, सूरत — कपड़ा ट्रेडर | ₹80,00,000 | 1% | ₹80,000 | ₹40,000 + ₹40,000 |
| कविता जोशी, इंदौर — छोटा रेस्टोरेंट (शराब नहीं) | ₹60,00,000 | 5% | ₹3,00,000 | ₹1,50,000 + ₹1,50,000 |
| अमन शर्मा, जयपुर — IT कंसल्टेंट (सर्विस) | ₹40,00,000 | 6% | ₹2,40,000 | ₹1,20,000 + ₹1,20,000 |
राजेश के मामले में, ₹80 लाख के टर्नओवर पर सिर्फ ₹80,000 यानी महीने के औसतन करीब ₹6,667 का टैक्स बनता है। कविता का रेस्टोरेंट ₹60 लाख टर्नओवर पर सालाना ₹3 लाख यानी हर महीने औसतन ₹25,000 टैक्स चुकाता है — इसकी वजह है कि रेस्टोरेंट सर्विस पर रेट (5%) ट्रेडिंग (1%) से ज़्यादा है। अमन, जो सर्विस प्रोवाइडर हैं, ₹40 लाख पर ₹2,40,000 यानी हर महीने औसतन ₹20,000 टैक्स चुकाते हैं। ध्यान रहे — इन तीनों को न तो खरीद पर चुकाए गए GST का ITC मिलेगा, न ही वे अपने ग्राहकों से अलग से GST वसूल कर सकते हैं; यह टैक्स उन्हें अपनी जेब से भरना है।
रजिस्ट्रेशन / कॉम्पोजीशन स्कीम चुनने का प्रोसेस
अगर आप पहले से GST रजिस्टर्ड हैं और रेगुलर स्कीम से कॉम्पोजीशन में जाना चाहते हैं, तो नए फाइनेंशियल ईयर की शुरुआत से पहले यह प्रोसेस पूरा करना होता है:
- GST पोर्टल पर लॉगिन करें (gst.gov.in) और Services → Registration → Application to opt for Composition Levy में जाएं।
- Form CMP-02 भरें और सबमिट करें — यह बताता है कि आप आने वाले फाइनेंशियल ईयर से कॉम्पोजीशन स्कीम चुनना चाहते हैं। यह फॉर्म फाइनेंशियल ईयर शुरू होने से पहले भरना ज़रूरी है (आमतौर पर 31 मार्च तक, अगली फाइनेंशियल ईयर के लिए)।
- Form ITC-03 फाइल करें — इसमें मौजूदा स्टॉक और कैपिटल गुड्स पर पहले क्लेम किए गए ITC को रिवर्स करना होता है, क्योंकि कॉम्पोजीशन स्कीम में ITC का फायदा नहीं मिलता।
- हर बिल ऑफ सप्लाई, नोटिस बोर्ड और दुकान के मुख्य प्रवेश स्थान पर “Composition Taxable Person” लिखना अनिवार्य है।
- नया रजिस्ट्रेशन लेने वाले बिज़नेस GST REG-01 फॉर्म में ही शुरू से कॉम्पोजीशन स्कीम चुन सकते हैं, अलग से CMP-02 भरने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
अगर टर्नओवर तय लिमिट पार कर जाए या कोई अयोग्यता वाली शर्त लागू हो जाए, तो 7 दिन के अंदर Form CMP-04 भरकर स्कीम से बाहर निकलने की सूचना देना ज़रूरी है। इसके बाद दोबारा रेगुलर स्कीम में ITC क्लेम करने के लिए Form ITC-01 भरा जाता है।

रिटर्न और कंप्लायंस कैलेंडर
कॉम्पोजीशन स्कीम का सबसे बड़ा फायदा यही है कि रिटर्न भरने का झंझट बहुत कम है — पूरे साल में सिर्फ एक बार डिटेल रिटर्न भरना होता है, बाकी हर क्वार्टर में सिर्फ एक छोटा पेमेंट स्टेटमेंट।
| फॉर्म | किसलिए | कब भरना है (FY 2026-27) |
|---|---|---|
| CMP-08 | क्वार्टरली टैक्स पेमेंट-कम-स्टेटमेंट | हर क्वार्टर खत्म होने के महीने के बाद, 18 तारीख तक — Q1: 18 जुलाई 2026, Q2: 18 अक्टूबर 2026, Q3: 18 जनवरी 2027, Q4: 18 अप्रैल 2027 |
| GSTR-4 | सालाना रिटर्न | फाइनेंशियल ईयर खत्म होने के बाद 30 जून तक (Notification No. 12/2024-Central Tax के बाद FY 2024-25 से यह तारीख 30 अप्रैल से बदलकर 30 जून कर दी गई है) |
| CMP-02 | स्कीम में ऑप्ट-इन की सूचना | नई फाइनेंशियल ईयर शुरू होने से पहले, आमतौर पर 31 मार्च तक |
अगर लगातार दो क्वार्टर तक CMP-08 नहीं भरा जाता, तो GST पोर्टल पर e-way bill जेनरेट करना ब्लॉक हो सकता है (Rule 138E)। इसलिए डेडलाइन मिस करना महंगा पड़ सकता है — समय पर पेमेंट और रिटर्न फाइल करना ज़रूरी है। यहां बताई गई GSTR-4 की नई तारीख (30 जून) को, पुराने नियम (30 अप्रैल) को याद रखने वाले कई बिज़नेस अब भी गलती से मिस कर देते हैं, इसलिए अपने CA या GST पोर्टल की नोटिफिकेशन से इसे ज़रूर दोबारा कन्फर्म कर लें।
कॉम्पोजीशन स्कीम के फायदे और नुकसान
| फायदे | नुकसान |
|---|---|
| टैक्स रेट बहुत कम (1% से 6%) | Input Tax Credit (ITC) का फायदा नहीं मिलता |
| सालभर में सिर्फ 1 डिटेल रिटर्न (GSTR-4) + 4 छोटे क्वार्टरली पेमेंट | ग्राहकों से GST अलग से नहीं वसूल सकते — टैक्स अपनी जेब से भरना है |
| डिटेल्ड अकाउंटिंग रिकॉर्ड रखने की ज़रूरत कम | किसी भी दूसरे राज्य में सामान/सर्विस नहीं बेच सकते |
| इनवॉइस-लेवल मैचिंग और HSN-वाइज डिटेल की टेंशन नहीं | E-commerce पर सर्विस बेचने की इजाज़त नहीं (TCS वाले ऑपरेटर के ज़रिए) |
| छोटे बिज़नेस के लिए वर्किंग कैपिटल पर बोझ कम | ग्राहक (अगर बिज़नेस है) को आपका ITC पास-ऑन नहीं हो पाता, जिससे B2B ग्राहक कम आकर्षित हो सकते हैं |
किसे कॉम्पोजीशन स्कीम चुननी चाहिए और किसे नहीं?
| चुन सकते हैं | शायद मुश्किल हो |
|---|---|
| जो सामान/सर्विस सिर्फ अपने राज्य में ही बेचते हैं (जैसे लोकल किराना, सैलून, छोटा रेस्टोरेंट) | जो मुख्य रूप से B2B ग्राहकों को सप्लाई करते हैं जिन्हें ITC चाहिए |
| जिनका ज़्यादा खर्च सीधे कच्चे माल/इनपुट के बजाय लेबर या सर्विस पर होता है (ITC का फायदा वैसे भी कम मिलता) | जो दूसरे राज्यों में सामान सप्लाई करते हैं या एक्सपोर्ट करते हैं |
| जो अकाउंटिंग और GST कंप्लायंस में ज़्यादा समय नहीं दे सकते | जो बड़ी मात्रा में टैक्सेबल खरीद करते हैं जिन पर ITC का बड़ा फायदा मिल सकता था |

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FAQ — GST कॉम्पोजीशन स्कीम से जुड़े सवाल
Q1. GST कॉम्पोजीशन स्कीम किसके लिए है?
यह उन छोटे और मीडियम बिज़नेस के लिए है जिनका सालाना टर्नओवर गुड्स के लिए ₹1.5 करोड़ (स्पेशल कैटेगरी राज्यों में ₹75 लाख) और सर्विस के लिए ₹50 लाख तक है, और जो सिर्फ अपने राज्य के अंदर कारोबार करते हैं।
Q2. क्या कॉम्पोजीशन स्कीम में Input Tax Credit (ITC) मिलता है?
नहीं। कॉम्पोजीशन स्कीम चुनने वाले डीलर खरीद पर चुकाए गए GST का ITC क्लेम नहीं कर सकते। यही इस स्कीम का सबसे बड़ा ट्रेड-ऑफ है — कम टैक्स रेट के बदले ITC की सुविधा नहीं मिलती।
Q3. क्या कॉम्पोजीशन डीलर ग्राहकों से GST वसूल कर सकता है?
नहीं, कॉम्पोजीशन डीलर टैक्स इनवॉइस नहीं, बल्कि Bill of Supply जारी करता है, और उस पर GST अलग से नहीं दिखाया जा सकता। टैक्स की पूरी राशि डीलर को अपने मुनाफे से चुकानी होती है।
Q4. कॉम्पोजीशन स्कीम में कौन से रिटर्न भरने होते हैं?
हर क्वार्टर Form CMP-08 (18 तारीख तक पेमेंट-कम-स्टेटमेंट) और साल में एक बार Form GSTR-4 (फाइनेंशियल ईयर खत्म होने के बाद 30 जून तक) भरना होता है।
Q5. क्या रेस्टोरेंट कॉम्पोजीशन स्कीम ले सकता है?
हां, लेकिन सिर्फ वह रेस्टोरेंट जो शराब नहीं बेचता। ऐसे रेस्टोरेंट पर 5% (2.5% CGST + 2.5% SGST) का रेट लागू होता है, और टर्नओवर लिमिट ₹1.5 करोड़ है।
Q6. अगर टर्नओवर लिमिट पार हो जाए तो क्या होगा?
लिमिट पार होने की तारीख से 7 दिन के अंदर Form CMP-04 भरकर स्कीम से बाहर निकलने की सूचना देनी होगी, और उस तारीख से रेगुलर GST स्कीम के नियम (टैक्स इनवॉइस, मंथली रिटर्न, ITC) लागू हो जाएंगे।
Q7. क्या फ्रीलांसर या कंसल्टेंट कॉम्पोजीशन स्कीम ले सकते हैं?
हां, Section 10(2A) के तहत सर्विस प्रोवाइडर (जिनमें फ्रीलांसर और कंसल्टेंट भी शामिल हैं) ₹50 लाख तक के टर्नओवर पर 6% की दर से कॉम्पोजीशन स्कीम चुन सकते हैं, बशर्ते वे सिर्फ अपने राज्य के अंदर सर्विस दें।
Q8. क्या कॉम्पोजीशन स्कीम से बाहर आकर दोबारा रेगुलर स्कीम में जा सकते हैं?
हां, कोई भी टैक्सपेयर अपनी इच्छा से भी कॉम्पोजीशन स्कीम छोड़कर रेगुलर स्कीम में जा सकता है। इसके लिए GST पोर्टल पर विदड्रॉल एप्लिकेशन (Form CMP-04) भरनी होती है, और स्टॉक पर ITC क्लेम करने के लिए Form ITC-01 फाइल करना होता है।
रेगुलर स्कीम बनाम कॉम्पोजीशन स्कीम — ITC का ट्रेड-ऑफ कब बड़ा होता है?
यह समझना ज़रूरी है कि ITC न मिलना कब बड़ा नुकसान बनता है और कब मामूली। अगर आपका बिज़नेस ऐसा है जिसमें कच्चे माल/इनपुट पर खर्च ज़्यादा होता है और उन पर GST की दर भी ऊंची (18% जैसी) है, तो रेगुलर स्कीम में ITC का फायदा बड़ा हो सकता है, और कॉम्पोजीशन स्कीम में जाने से वह फायदा छूट जाता है। लेकिन अगर आपका बिज़नेस मुख्यतः लेबर-इंटेंसिव है (जैसे सैलून, टेलरिंग, छोटी सर्विस), जहां इनपुट पर खर्च ही कम होता है, तो ITC छोड़ने का नुकसान भी उतना बड़ा नहीं होता, और कम टैक्स रेट का फायदा साफ दिखता है। इसलिए किसी एक फॉर्मूले से फैसला नहीं लिया जा सकता — अपने बिज़नेस के खरीद-बिक्री के पुराने डेटा के आधार पर दोनों स्कीम में अनुमानित टैक्स आउटगो की तुलना करना ही सबसे सही तरीका है।
निष्कर्ष
GST कॉम्पोजीशन स्कीम हर बिज़नेस के लिए सही नहीं है, लेकिन जो छोटे व्यापारी, मैन्युफैक्चरर, सैलून, छोटे रेस्टोरेंट या लोकल सर्विस प्रोवाइडर सिर्फ अपने राज्य में कारोबार करते हैं और जिनके ग्राहक मुख्यतः B2C हैं, उनके लिए यह स्कीम कंप्लायंस का बोझ बहुत हल्का कर देती है। टर्नओवर लिमिट (गुड्स के लिए ₹1.5 करोड़, सर्विस के लिए ₹50 लाख), टैक्स रेट (1% से 6%), और यह बात ध्यान में रखें कि ITC और इंटर-स्टेट सप्लाई की सुविधा नहीं मिलेगी — इन तीन बातों के आधार पर आप और आपके CA आसानी से तय कर सकते हैं कि यह स्कीम आपके बिज़नेस के लिए फायदेमंद है या नहीं। किसी भी फैसले से पहले अपने बिज़नेस के पुराने तीन-चार महीनों के खरीद और बिक्री डेटा के आधार पर रेगुलर बनाम कॉम्पोजीशन स्कीम की तुलना अपने CA से ज़रूर करा लें।
डिस्क्लेमर: यह लेख सिर्फ सामान्य जानकारी और शिक्षा के मकसद से लिखा गया है, यह टैक्स या कानूनी सलाह नहीं है। GST के नियम, टर्नओवर लिमिट, रेट और फॉर्म की डेडलाइन समय-समय पर नोटिफिकेशन के ज़रिए बदलती रहती हैं। अपने बिज़नेस के लिए कॉम्पोजीशन स्कीम चुनने या छोड़ने से पहले हमेशा नवीनतम जानकारी GST पोर्टल (gst.gov.in) और अपने CA या टैक्स सलाहकार से ज़रूर कन्फर्म कर लें।
