जयपुर में सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करने वाले रोहित शर्मा की उम्र 32 साल है। सैलरी ₹75,000 महीना, होम लोन की EMI ₹28,000, एक 4 साल की बेटी, और घर पर पत्नी स्नेहा जो अभी नौकरी नहीं करती। पिछले हफ्ते दफ्तर के एक सहकर्मी की हार्ट अटैक से अचानक मौत हो गई — उम्र सिर्फ 34 साल थी। उस खबर ने रोहित को हिला दिया। उसी रात उसने गूगल पर टाइप किया — “टर्म इंश्योरेंस क्या है, कितना लेना चाहिए।”
अगर आपके मन में भी यही सवाल है, तो यह गाइड आपके लिए है। यहाँ हम सीधी भाषा में समझेंगे कि टर्म इंश्योरेंस क्या है, कितना कवर लेना चाहिए, 2026 में टैक्स बेनिफिट कैसे मिलता है, क्लेम सेटलमेंट रेशियो क्यों ज़रूरी है, और टर्म इंश्योरेंस खरीदते समय किन गलतियों से बचना चाहिए।
टर्म इंश्योरेंस क्या है? एक नज़र में
टर्म इंश्योरेंस सबसे सीधा और सबसे सस्ता लाइफ इंश्योरेंस प्रोडक्ट है। आप एक तय अवधि (टर्म) के लिए एक तय प्रीमियम भरते हैं, और अगर उस दौरान पॉलिसीधारक की मौत हो जाती है, तो नॉमिनी को एक तय रकम (सम एश्योर्ड) मिलती है। अगर पॉलिसीधारक पूरी टर्म तक जीवित रहता है, तो सामान्य (प्योर) टर्म प्लान में कोई मैच्योरिटी पैसा वापस नहीं मिलता — यह सिर्फ प्रोटेक्शन के लिए है, निवेश के लिए नहीं।
| जानकारी | विवरण |
|---|---|
| मकसद | सिर्फ आर्थिक सुरक्षा (प्रोटेक्शन), निवेश नहीं |
| मैच्योरिटी बेनिफिट | प्योर टर्म में नहीं (TROP वैरिएंट में प्रीमियम वापस मिल सकता है) |
| प्रीमियम | बाकी लाइफ इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स से सबसे कम |
| कवर | कम प्रीमियम में बहुत ज़्यादा सम एश्योर्ड |
| टर्म (अवधि) | आम तौर पर 10 से 40 साल, या एक तय उम्र (जैसे 65/75 साल) तक |
| टैक्स बेनिफिट | पुरानी टैक्स रिजीम में सेक्शन 80C/10(10D), नई रिजीम में सिर्फ डेथ बेनिफिट टैक्स-फ्री |
| किसके लिए ज़रूरी | जिस पर परिवार आर्थिक रूप से निर्भर है (कमाने वाला सदस्य) |
टर्म इंश्योरेंस और दूसरी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी में क्या फर्क़ है?
बाज़ार में एंडोमेंट, ULIP और TROP (Term Return of Premium) जैसे कई विकल्प मिलते हैं। इनमें फर्क़ समझना ज़रूरी है, क्योंकि एजेंट अक्सर “सेविंग भी, प्रोटेक्शन भी” कहकर महंगे प्लान बेच देते हैं।
| प्लान | मैच्योरिटी पर पैसा वापस? | प्रीमियम | निवेश रिटर्न कैसा |
|---|---|---|---|
| प्योर टर्म | नहीं | सबसे कम | कोई निवेश हिस्सा नहीं |
| TROP (प्रीमियम वापसी) | हां, कुल प्रीमियम वापस | प्योर टर्म से 2-3 गुना ज़्यादा | बहुत कम (महंगाई से भी कम) |
| एंडोमेंट प्लान | हां, बोनस के साथ | बहुत ज़्यादा | आम तौर पर 4-6% सालाना |
| ULIP | हां, मार्केट-लिंक्ड | ज़्यादा | मार्केट पर निर्भर, चार्ज भी ज़्यादा |
ज़्यादातर फाइनेंशियल प्लानर यही सलाह देते हैं — इंश्योरेंस और निवेश को अलग-अलग रखें। प्योर टर्म प्लान से सस्ते में बड़ा कवर लें, और बचा हुआ पैसा इमरजेंसी फंड या SIP/म्यूचुअल फंड में अलग से निवेश करें। आगे इस आर्टिकल में हम देखेंगे कि यह तरीका TROP से कितना फायदेमंद हो सकता है।

कितना कवर लेना चाहिए? दो आसान तरीके
“कितना इंश्योरेंस लूं” यह सवाल ज़्यादातर लोगों को उलझाता है। नीचे दो तरीके दिए गए हैं — इन्हें मिलाकर एक उचित आंकड़े पर पहुंचा जा सकता है।
तरीका 1: इनकम मल्टीपल (सबसे आसान तरीका)
आम सलाह है कि अपनी सालाना इनकम का 15 से 20 गुना कवर लें। यह इस सोच पर आधारित है कि अगर आप नहीं रहे, तो यह रकम परिवार को इतने साल तक लगभग वैसी ही आमदनी दे सकती है (निवेश पर मिलने वाले ब्याज/रिटर्न को ध्यान में रखते हुए)।
तरीका 2: लायबिलिटी + भविष्य के गोल्स (ज़्यादा सटीक तरीका)
इसमें आप अपने सारे कर्ज़ (होम लोन, कार लोन) और भविष्य के ज़रूरी खर्च (बच्चों की पढ़ाई, शादी) जोड़ते हैं, और उसमें से अपनी मौजूदा बचत/निवेश घटा देते हैं।
रोहित का उदाहरण: दोनों तरीकों से कैलकुलेशन
रोहित की सालाना इनकम ₹9,00,000 है। आइए पायथन से दोनों तरीके से हिसाब लगाते हैं (यह सिर्फ एक उदाहरण है, आपका आंकड़ा आपकी अपनी स्थिति के हिसाब से अलग होगा):
| तरीका | कैलकुलेशन | नतीजा |
|---|---|---|
| इनकम मल्टीपल (15x) | ₹9,00,000 × 15 | ₹1,35,00,000 |
| इनकम मल्टीपल (20x) | ₹9,00,000 × 20 | ₹1,80,00,000 |
| होम लोन बकाया | — | ₹35,00,000 |
| कार लोन बकाया | — | ₹3,00,000 |
| बेटी की पढ़ाई (भविष्य अनुमानित खर्च) | — | ₹25,00,000 |
| घटाएं: मौजूदा बचत/निवेश | — | -₹4,00,000 |
| लायबिलिटी+गोल्स तरीके से कुल ज़रूरत | 35+3+25-4 लाख | ₹59,00,000 |
दोनों तरीकों में बड़ा फर्क़ दिख रहा है — इनकम मल्टीपल से ₹1.35-1.8 करोड़ और लायबिलिटी+गोल्स से सिर्फ ₹59 लाख। ज़्यादातर फाइनेंशियल प्लानर सलाह देते हैं कि दोनों में जो बड़ा आंकड़ा हो, उसके करीब जाएं — क्योंकि इनकम मल्टीपल तरीका आगे चलने वाली महंगाई और परिवार की जीवनशैली को भी कवर करता है, जबकि सिर्फ लायबिलिटी देखना रूढ़िवादी (कंज़र्वेटिव) हिसाब है। रोहित के केस में एक गोल, साफ ₹1.5 करोड़ का कवर दोनों तरीकों के बीच एक संतुलित विकल्प है। यह सिर्फ एक उदाहरण है — अपने लिए सही आंकड़ा तय करने से पहले किसी भरोसेमंद फाइनेंशियल प्लानर से भी बात करें।
प्रीमियम किन चीज़ों पर निर्भर करता है?
- उम्र: जितनी कम उम्र में लेंगे, प्रीमियम उतना ही कम रहेगा — उम्र बढ़ने के साथ प्रीमियम तेज़ी से बढ़ता है।
- स्मोकिंग/तंबाकू: स्मोकर का प्रीमियम नॉन-स्मोकर से काफी ज़्यादा होता है।
- सेहत और मेडिकल हिस्ट्री: डायबिटीज, बीपी या पुरानी बीमारी होने पर प्रीमियम बढ़ सकता है या मेडिकल टेस्ट ज़रूरी हो जाता है।
- पेशा: जोखिम वाले पेशे (जैसे माइनिंग, एविएशन) में प्रीमियम ज़्यादा हो सकता है।
- टर्म की लंबाई: लंबी अवधि के लिए सालाना प्रीमियम अलग तरीके से तय होता है।
- राइडर्स: क्रिटिकल इलनेस, एक्सीडेंटल डेथ बेनिफिट, वेवर ऑफ प्रीमियम जैसे ऐड-ऑन लेने पर प्रीमियम बढ़ता है।
टैक्स बेनिफिट 2026 में — नए Income Tax Act के बाद क्या बदला
1 अप्रैल 2026 से नया Income Tax Act 2025 लागू हो गया है, और इसमें सेक्शन नंबर बदले हैं, हालांकि नियम लगभग वही हैं। टर्म इंश्योरेंस के लिए दो तरह के टैक्स बेनिफिट समझना ज़रूरी है:
| बेनिफिट | पुराना सेक्शन | नया सेक्शन (2025 एक्ट) | पुरानी टैक्स रिजीम | नई टैक्स रिजीम |
|---|---|---|---|---|
| प्रीमियम पर डिडक्शन (₹1.5 लाख तक, 80C की कुल सीमा में) | सेक्शन 80C | सेक्शन 123 | मिलता है | नहीं मिलता |
| मौत पर मिली रकम टैक्स-फ्री | सेक्शन 10(10D) | सेक्शन 11, शेड्यूल II के साथ | मिलता है | मिलता है |
यानी सबसे ज़रूरी बात यह है — टर्म इंश्योरेंस की मौत पर मिलने वाली रकम दोनों टैक्स रिजीम में टैक्स-फ्री रहती है (बशर्ते पॉलिसी शर्तों पर ली गई हो)। लेकिन प्रीमियम पर ₹1.5 लाख तक की छूट सिर्फ पुरानी टैक्स रिजीम चुनने पर मिलती है। अगर आप नई टैक्स रिजीम में हैं (जो आज ज़्यादातर नए टैक्सपेयर के लिए डिफॉल्ट है), तो सिर्फ टैक्स बचाने के लिए पुरानी रिजीम में जाना फायदेमंद है या नहीं, यह आपकी पूरी इनकम और बाकी डिडक्शन देखकर तय करें — सिर्फ इस एक छूट के लिए रिजीम बदलना हर किसी के लिए सही नहीं होता। यह ज़रूर ध्यान रखें कि अगर पॉलिसी जारी होने की तारीख 1 अप्रैल 2012 के बाद की है, तो सालाना प्रीमियम सम एश्योर्ड के 10% से ज़्यादा नहीं होना चाहिए, वरना डिडक्शन और टैक्स-फ्री बेनिफिट दोनों में फर्क़ पड़ सकता है।

वेटिंग पीरियड, सुसाइड क्लॉज़, फ्री लुक पीरियड और ग्रेस पीरियड
यह चार शब्द हर पॉलिसी डॉक्यूमेंट में आते हैं, लेकिन लोग इन्हें पढ़े बिना साइन कर देते हैं।
| शब्द | मतलब |
|---|---|
| वेटिंग पीरियड | ज़्यादातर प्योर टर्म प्लान में कोई सामान्य वेटिंग पीरियड नहीं होता — बीमारी या प्राकृतिक मौत पहले दिन से कवर होती है। कुछ सरल/गारंटीड-इश्यूएंस प्लान (जैसे Saral Jeevan Bima) में शुरुआती 45 दिन सिर्फ एक्सीडेंटल मौत कवर करते हैं। |
| सुसाइड क्लॉज़ | पॉलिसी शुरू होने (या रिवाइवल) के 12 महीने के भीतर सुसाइड से मौत होने पर पूरा सम एश्योर्ड नहीं मिलता — आम तौर पर भरे गए प्रीमियम का लगभग 80% नॉमिनी को वापस किया जाता है। |
| फ्री लुक पीरियड | IRDAI के सितंबर 2024 के मास्टर सर्कुलर के बाद यह सभी पॉलिसी पर 15 दिन से बढ़ाकर 30 दिन कर दिया गया है — इस दौरान पॉलिसी पसंद न आए तो बिना कारण बताए वापस कर सकते हैं (कुछ कटौती के साथ पैसा वापस मिलता है)। |
| ग्रेस पीरियड | प्रीमियम न भरने पर भी पॉलिसी चालू रहने का समय — मंथली मोड में सामान्यतः 15 दिन, क्वार्टरली/हाफ-ईयरली/ईयरली मोड में 30 दिन (अपनी पॉलिसी में सही आंकड़ा ज़रूर चेक करें, इंश्योरर के हिसाब से थोड़ा अलग हो सकता है)। |
सुसाइड क्लॉज़ का उदाहरण (सिर्फ समझने के लिए)
मान लीजिए किसी की मंथली प्रीमियम ₹1,000 है और पॉलिसी शुरू होने के 11वें महीने में सुसाइड से मौत हो जाती है (यानी 12 महीने की सीमा के भीतर)। ऐसे में —
- कुल भरा गया प्रीमियम: 11 × ₹1,000 = ₹11,000
- 80% रिफंड: ₹11,000 × 0.80 = ₹8,800
- पूरा सम एश्योर्ड (जैसे ₹1 करोड़) इस केस में नॉमिनी को नहीं मिलेगा, सिर्फ यह छोटा प्रीमियम रिफंड मिलेगा।
यह उदाहरण दिखाता है कि यह क्लॉज़ कितना गंभीर है, और परिवार के किसी सदस्य को मानसिक तनाव होने पर उसकी मदद करना क्यों ज़रूरी है।
क्लेम सेटलमेंट रेशियो 2024-25 — कौन सा इंश्योरर कितना भरोसेमंद
क्लेम सेटलमेंट रेशियो बताता है कि इंश्योरर ने कुल आए दावों में से कितने प्रतिशत का भुगतान किया। IRDAI के मुताबिक FY2024-25 के आंकड़े इस तरह रहे:
| इंश्योरर/समूह | क्लेम सेटलमेंट रेशियो (FY2024-25) |
|---|---|
| LIC | 97.08% (संख्या के आधार पर; ₹ वैल्यू के हिसाब से 79.70% दावे 30 दिन के भीतर) |
| पूरी इंडस्ट्री (LIC + प्राइवेट) | 97.10% |
| प्राइवेट इंश्योरर्स (औसत) | लगभग 97.30% |
ध्यान रहे, यह आंकड़ा सभी तरह के इंडिविजुअल डेथ क्लेम (टर्म, एंडोमेंट, ULIP सब मिलाकर) का है — सिर्फ टर्म इंश्योरेंस का अलग आंकड़ा हर साल सार्वजनिक रूप से अलग नहीं दिया जाता। कोई भी पॉलिसी लेने से पहले इंश्योरर की वेबसाइट या IRDAI की ताज़ा एन्युअल रिपोर्ट से मौजूदा साल का आंकड़ा खुद चेक करें, क्योंकि यह हर साल बदलता है।
क्लेम सेटलमेंट की समय-सीमा — नया नियम
IRDAI के सितंबर 2024 के मास्टर सर्कुलर के बाद लाइफ इंश्योरेंस क्लेम के लिए समय-सीमा भी सख्त कर दी गई है:
- जिन दावों में जांच (इन्वेस्टिगेशन) ज़रूरी नहीं है, उन्हें 15 दिन के भीतर निपटाना होगा।
- जिन दावों में जांच ज़रूरी है, उन्हें 45 दिन के भीतर निपटाना होगा (पहले यह सीमा 90 दिन तक जा सकती थी)।
- देरी होने पर इंश्योरर को बिना मांगे मौजूदा ब्याज दर + 2% की दर से ब्याज देना होगा।
- मिस-सेलिंग रोकने के लिए पॉलिसी जारी होने से पहले प्रीमियम नहीं लिया जा सकता, और हर पॉलिसी के साथ एक आसान “Customer Information Sheet” देना ज़रूरी है।

Pure Term vs TROP — कौन सा प्लान सही है?
बहुत से लोग सोचते हैं कि “अगर मैं नहीं मरा तो पैसा डूब जाएगा,” इसलिए वे TROP (Term Return of Premium) लेते हैं जिसमें टर्म खत्म होने पर सारा प्रीमियम वापस मिल जाता है। लेकिन यह हिसाब से देखना ज़रूरी है। नीचे एक इलस्ट्रेटिव उदाहरण है (यह किसी खास इंश्योरर का कोटेशन नहीं है, सिर्फ समझने के लिए अनुमानित आंकड़े हैं) — 30 साल की उम्र में ₹1 करोड़ कवर, 30 साल की टर्म:
| प्लान | अनुमानित सालाना प्रीमियम | 30 साल में कुल भुगतान | टर्म खत्म होने पर वापसी |
|---|---|---|---|
| प्योर टर्म | ₹13,500 (अनुमानित) | ₹4,05,000 | ₹0 (पॉलिसीधारक जीवित रहने पर) |
| TROP | ₹32,000 (अनुमानित) | ₹9,60,000 | लगभग ₹9,60,000 (भरा गया प्रीमियम) |
फर्क़ ₹18,500 सालाना का है। अगर यह फर्क़ हर साल किसी SIP या इंडेक्स फंड में डाला जाए और मान लें (सिर्फ उदाहरण के लिए) 10% सालाना रिटर्न मिलता है, तो 30 साल बाद यह रकम पायथन से कैलकुलेट करने पर लगभग ₹33,47,453 बन जाती है — जो TROP की ₹9,60,000 की वापसी से लगभग ₹23,87,453 ज़्यादा है। यह सिर्फ एक इलस्ट्रेटिव उदाहरण है; असली रिटर्न बाज़ार पर निर्भर करता है और गारंटीड नहीं है, जबकि TROP की वापसी गारंटीड होती है — यह फर्क़ भी ध्यान में रखें। लेकिन यही वजह है कि ज़्यादातर फाइनेंशियल प्लानर “प्योर टर्म + अलग निवेश” का तरीका सुझाते हैं।
टर्म इंश्योरेंस कैसे खरीदें? स्टेप-बाय-स्टेप
- कवर अमाउंट तय करें: ऊपर बताए तरीकों से अपनी ज़रूरत का हिसाब लगाएं।
- टर्म (अवधि) चुनें: आम तौर पर जब तक आप कमाते रहेंगे, यानी रिटायरमेंट की उम्र तक (जैसे 60-65 साल)।
- 2-3 इंश्योरर की तुलना करें: प्रीमियम के साथ क्लेम सेटलमेंट रेशियो, सॉल्वेंसी रेशियो और कस्टमर रिव्यू भी देखें।
- सही जानकारी दें: स्मोकिंग, बीमारी, पुरानी हेल्थ हिस्ट्री सब सही-सही बताएं — गलत जानकारी से क्लेम रिजेक्ट हो सकता है।
- ज़रूरी राइडर चुनें: क्रिटिकल इलनेस या एक्सीडेंटल डेथ बेनिफिट अगर ज़रूरी लगे तो जोड़ें।
- मेडिकल टेस्ट कराएं (अगर ज़रूरी हो): बड़े कवर के लिए अक्सर मेडिकल टेस्ट ज़रूरी होता है।
- नॉमिनी की पूरी जानकारी भरें: नाम, रिश्ता, संपर्क विवरण सही भरें ताकि क्लेम के समय परेशानी न हो।
- पॉलिसी डॉक्यूमेंट पढ़ें: फ्री लुक पीरियड के अंदर पूरी पॉलिसी पढ़ें, एक्सक्लूज़न ज़रूर समझें।

किसके लिए टर्म इंश्योरेंस सही है, किसके लिए नहीं?
| स्थिति | टर्म इंश्योरेंस ज़रूरी है? |
|---|---|
| घर में कमाने वाला एक ही सदस्य है और परिवार निर्भर है | हां, बहुत ज़रूरी |
| होम लोन या बड़ा कर्ज़ है | हां, कर्ज़ चुकता होने तक ज़रूरी |
| छोटे बच्चे हैं जिनकी पढ़ाई/भविष्य का खर्च बाकी है | हां, बहुत ज़रूरी |
| अकेले हैं, कोई डिपेंडेंट नहीं, कोई कर्ज़ नहीं | ज़रूरी नहीं, पहले इमरजेंसी फंड और हेल्थ इंश्योरेंस पर ध्यान दें |
| रिटायर हो चुके हैं, कोई इनकम डिपेंडेंट नहीं | आम तौर पर ज़रूरी नहीं |
आम गलतियां जो लोग टर्म इंश्योरेंस में करते हैं
- बहुत कम कवर लेना: सिर्फ ₹10-20 लाख का कवर लेकर संतुष्ट हो जाना, जो आज के खर्च और महंगाई के हिसाब से बहुत कम है।
- टर्म इंश्योरेंस को निवेश समझना: “पैसा वापस नहीं मिलेगा” सोचकर महंगा एंडोमेंट/TROP ले लेना और कवर कम रह जाना।
- मेडिकल जानकारी छिपाना: स्मोकिंग या बीमारी छिपाने पर क्लेम के समय इंश्योरेंस कंपनी जांच करके पूरा क्लेम रिजेक्ट कर सकती है।
- नॉमिनी अपडेट न करना: शादी, बच्चे होने जैसी घटनाओं के बाद नॉमिनी डिटेल अपडेट नहीं करना।
- सिर्फ एक ही इंश्योरर का प्रीमियम देखकर फैसला लेना: क्लेम सेटलमेंट रेशियो और सर्विस क्वालिटी नज़रअंदाज़ करना।
- पॉलिसी लैप्स होने देना: प्रीमियम भूल जाने पर ग्रेस पीरियड के बाद पॉलिसी लैप्स हो सकती है और कवर खत्म हो सकता है।
टर्म इंश्योरेंस खरीदने से पहले चेकलिस्ट
- अपनी सालाना इनकम, कुल कर्ज़ और भविष्य के गोल्स का हिसाब लगा लिया है।
- इनकम मल्टीपल और लायबिलिटी+गोल्स — दोनों तरीकों से कवर अमाउंट चेक किया है।
- 2-3 इंश्योरर के प्रीमियम और क्लेम सेटलमेंट रेशियो की तुलना की है।
- पुरानी vs नई टैक्स रिजीम में अपने लिए क्या फायदेमंद है, यह समझ लिया है।
- मेडिकल और स्मोकिंग से जुड़ी सारी जानकारी सही-सही भरी है।
- नॉमिनी की पूरी और सही जानकारी भरी है।
- फ्री लुक पीरियड के 30 दिनों के अंदर पूरी पॉलिसी पढ़ ली है।
- प्रीमियम भरने के लिए ऑटो-डेबिट सेट कर दिया है ताकि ग्रेस पीरियड में भी चूक न हो।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
Q1. टर्म इंश्योरेंस और लाइफ इंश्योरेंस में क्या फर्क़ है?
टर्म इंश्योरेंस, लाइफ इंश्योरेंस की ही एक किस्म है। “लाइफ इंश्योरेंस” एक बड़ा शब्द है जिसमें टर्म, एंडोमेंट, ULIP, मनी-बैक जैसे सभी प्रोडक्ट आते हैं। टर्म इंश्योरेंस इनमें सबसे सीधा और सबसे सस्ता है, क्योंकि इसमें कोई निवेश हिस्सा नहीं होता।
Q2. क्या टर्म इंश्योरेंस में मैच्योरिटी पर पैसा मिलता है?
प्योर टर्म प्लान में नहीं। अगर आपको मैच्योरिटी पर पैसा वापस चाहिए, तो TROP (Term Return of Premium) वैरिएंट चुन सकते हैं, लेकिन उसका प्रीमियम प्योर टर्म से काफी ज़्यादा होता है।
Q3. टर्म इंश्योरेंस कितने साल के लिए लेना चाहिए?
आम सलाह है कि जब तक आप कमाते रहेंगे या जब तक परिवार आप पर आर्थिक रूप से निर्भर है, उस पूरी अवधि के लिए कवर लें — आम तौर पर रिटायरमेंट की उम्र (60-65 साल) तक।
Q4. क्या टर्म इंश्योरेंस का प्रीमियम नई टैक्स रिजीम में भी डिडक्ट होता है?
नहीं। सेक्शन 80C (नए एक्ट में सेक्शन 123) के तहत प्रीमियम पर डिडक्शन सिर्फ पुरानी टैक्स रिजीम में मिलता है। हालांकि मौत पर मिलने वाली रकम दोनों रिजीम में टैक्स-फ्री रहती है।
Q5. अगर पॉलिसीधारक सुसाइड से मर जाए तो क्या होता है?
पॉलिसी शुरू होने के पहले 12 महीनों के भीतर सुसाइड से मौत होने पर सम एश्योर्ड नहीं मिलता, सिर्फ भरे गए प्रीमियम का लगभग 80% नॉमिनी को रिफंड किया जाता है। 12 महीने के बाद यह एक्सक्लूज़न लागू नहीं होता।
Q6. ऑनलाइन टर्म इंश्योरेंस खरीदना सुरक्षित है?
हां, ऑनलाइन टर्म इंश्योरेंस IRDAI-रजिस्टर्ड इंश्योरर या उनके ऑफिशियल ऐप/वेबसाइट से खरीदना पूरी तरह सुरक्षित है, और अक्सर एजेंट कमीशन न होने से प्रीमियम भी थोड़ा कम पड़ता है।
Q7. क्लेम सेटलमेंट रेशियो देखकर इंश्योरर चुनना क्यों ज़रूरी है?
क्लेम सेटलमेंट रेशियो यह बताता है कि इंश्योरर ने अतीत में कितने दावों का भुगतान किया। ज़्यादा रेशियो (जैसे 97-99%) वाले इंश्योरर पर भरोसा थोड़ा ज़्यादा किया जा सकता है, हालांकि प्रीमियम, सर्विस क्वालिटी और राइडर जैसी बातें भी साथ में देखनी चाहिए।
Q8. क्या एक से ज़्यादा टर्म इंश्योरेंस पॉलिसी रख सकते हैं?
हां, अलग-अलग इंश्योरर से एक से ज़्यादा टर्म पॉलिसी रखी जा सकती हैं। कई लोग अपनी कुल ज़रूरत को दो पॉलिसी में बांटते हैं, जिससे क्लेम प्रोसेस में किसी एक इंश्योरर पर पूरी तरह निर्भरता नहीं रहती।
निष्कर्ष
टर्म इंश्योरेंस कोई जटिल प्रोडक्ट नहीं है — यह सिर्फ इतना कहता है: “अगर मैं नहीं रहा, तो मेरे परिवार को आर्थिक तकलीफ़ न हो।” सही कवर अमाउंट चुनना, प्योर टर्म और निवेश को अलग रखना, सही जानकारी देना, और क्लेम सेटलमेंट रेशियो देखकर इंश्योरर चुनना — यही चार बातें एक अच्छा फैसला बनाती हैं। रोहित जैसे किसी भी कमाने वाले सदस्य के लिए, एक सहकर्मी की अचानक मौत की खबर सुनने के बाद पॉलिसी लेना नहीं, बल्कि आज ही अपनी ज़रूरत का हिसाब लगाकर सही कवर लेना समझदारी है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल शैक्षणिक जानकारी के लिए है, इसे निवेश या इंश्योरेंस सलाह न मानें। इसमें दिए गए प्रीमियम, कवर अमाउंट और रिटर्न के उदाहरण पूरी तरह अनुमानित और इलस्ट्रेटिव हैं, किसी खास इंश्योरर का कोटेशन नहीं हैं — असली प्रीमियम और शर्तें आपकी उम्र, सेहत और चुने गए प्लान के हिसाब से अलग होंगी। टैक्स और IRDAI नियमों में बदलाव होते रहते हैं, इसलिए पॉलिसी लेने से पहले इंश्योरर की आधिकारिक वेबसाइट, IRDAI की वेबसाइट या अपने CA/फाइनेंशियल एडवाइज़र से नवीनतम जानकारी ज़रूर पुष्टि करें। Moneycontrol24.com (Hindi Finance Hub) एक स्वतंत्र वेबसाइट है और इसका Moneycontrol.com से कोई संबंध नहीं है।
